देश 15 अगस्त 1947 को जब आज़ाद हुआ, तो यह आज़ादी देश के विभाजन के साथ मिली थी। देश का यह बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था। पंजाब और बंगाल के मुसलमान बहुसंख्यक हिस्सों को मुस्लिम बहुल राज्यों के साथ जोड़कर एक नया देश पाकिस्तान बना। इस बंटवारे में लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को अपना गाँव और अपना शहर छोड़ना पड़ा जहां उनकी कई पीढ़ियाँ सेंकड़ों सालों से रहती आ रही थीं।
वही घर, गाँव, शहर और उनसे जुड़ी हर चीज उनकी पहचान थी। वहाँ उनके घर थे, खेत थे और व्यवसाय था। उस मिट्टी में वे रचे-बसे थे जहां से जबरन उन्हें उखाड़ फेंका गया। अपनी ज़मीन से उखड़े हुए ये लोग क्या कभी चैन से रह सके? क्या वह अतीत बिना पीड़ा पहुंचाए आसानी से उनसे अलग हो गया? क्या जब उन्हें अपने घर, गाँव और ज़मीन से भागना पड़ा तब उनमें कहीं यह उम्मीद ज़िंदा थी कि किसी दिन वे वापस लौट आएंगे? इम्तियाज़ अली की फिल्म ‘मैं वापस आऊँगा’ उसी उम्मीद के सहारे ज़िंदा रहते एक वृद्ध की कहानी है जिसने 78 साल पहले किसी को वचन दिया था कि ‘मैं वापस आऊँगा’।
विभाजन की यह कहानी 95 वर्षीय ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह) की स्मृतियों के रूप में सामने आती है। वह मृत्यु शैय्या पर है और डिमेंसिया और अल्जाइमर का मरीज है। वर्तमान और अतीत दोनों उसके अंदर गड्डमड्ड हो गए हैं। उसके दोनों बेटे उसकी सेवा में लगे हैं जिन्हें लगता है कि उनके पिता की कभी भी मृत्यु हो सकती हैं। लेकिन विभाजन से जुड़ी स्मृतियों में उसकी सांस अटकी हुई है। बीच-बीच में ईशर सिंह वर्तमान को भूल जाते हैं और 1947 के पहले के सरगोधा पहुँच जाते हैं जो उनकी जन्मभूमि है।
फिल्म की शुरुआत में ही वे ड्राइवर को लेकर अटारी पहुँच जाते हैं और जिद करते हैं कि उन्हें सरगोधा जाने दिया जाए। वे भूल गए हैं कि देश का विभाजन हो चुका है और सरगोधा अब पाकिस्तान में है।पुलिस उन्हें आगे नहीं जाने देती। उनकी तबीयत खराब हो जाती है। बेटे उन्हें वापस घर ले आते हैं। ईशर सिंह का पोता निर्वैर (दिलजीत दोसांझ) लंदन में रहता है जो एक लड़की से प्रेम करता है लेकिन वह ठीक-ठीक अपने प्रेम को पहचान नहीं पाता।
पिता इकबाल सिंह (रजत कपूर) से मालूम पड़ने पर कि दादाजी बहुत अधिक बीमार है और उनकी कभी भी मृत्यु हो सकती है, वह अंतिम समय में दादा को देखने के लिए अपने घर लौट आता है। वह अपना ज्यादा समय दादा के साथ गुजारता है।
अब तक दादा के बड़बड़ाने को किसी ने गंभीरता से नहीं लिया था लेकिन निर्वैर को महसूस होता है कि दादाजी का बड़बड़ाना निरर्थक नहीं है। वह अपने दादा के बड़बड़ाने को धीरे-धीरे समझने की कोशिश करता है और उसकी कोशिश से ही 1947 से पहले की कहानी के पन्ने एक-एक कर सामने आने लगते हैं। दर्शक शुरू-शुरू में अतीत और वर्तमान के इस तरह आने-जाने के साथ अपना तारतम्य नहीं बैठा पाते। खासतौर पर मध्यांतर से पहले।
और इसी कारण मध्यांतर से पहले कहानी बहुत धीमी चलती हुई महसूस होती है। लेकिन ऐसा है नहीं। दरअसल ध्यान दें तो कुछ भी ऐसा नहीं है जिनका बाद में घटित होने वाली भयावह त्रासदी से कोई संबंध न हो। मध्यांतर के बाद दर्शक फिल्म के उन हिस्सों से भी अपने को जोड़ पाता है जिसे उसने साधारण प्रेम कहानी समझ के वैसे ही गुजर जाने दिया था।
अतीत की कहानी शुरू होती है, सरगोधा के एक कॉलेज से जहां ईशर सिंह उर्फ कीनु (वेदांग रैना) पढ़ रहा है। उसी कॉलेज में अफसाना उर्फ जिया (शर्बरी) भी पढ़ रही है और ये दोनों एक दूसरे से प्यार भी करते हैं। कीनु सिख है और जिया मुसलमान। इन दोनों के प्यार को दिखाने के लिए जिन प्रसंगों की रचना की गयी है, वे प्रसंग उनके लगातार गाढ़े होते प्रेम को तो व्यक्त करते ही हैं, लेकिन इनके अलावा भी कुछ ऐसे अर्थों को ध्वनित करते हैं जिनका संबंध सिर्फ इन दोनों से नहीं होता बल्कि उनसे कहीं ज्यादा और बड़े यथार्थ से होता है।
पहले ही प्रसंग में कॉलेज के प्रांगण में प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (प्रगतिशील लेखक संघ) का एक जलसा हो रहा है, जिस जलसे में जिया प्रेमचंद की कहानी ‘दुनिया का सबसे अनमोल रत्न’ का उल्लेख करती है। इस कहानी की नायिका मल्लिका दिल फरेब का उल्लेख होता है और कीनु के लिए जिया दिलफरेब के रूप में उसके दिल में उतर आती है और वह अपने हाथ पर उर्दू में दिलफरेब लिखवा लेता है।
सतह पर देखने से यह कॉलेज में होने वाला एक मामूली सा साहित्यिक जलसा लगता है। लेकिन 1947 से पहले के अविभाजित भारत के संदर्भ में इसे देखें तो यह प्रसंग मामूली नहीं लगता। विश्व स्तर पर फासीवाद के बढ़ते खतरे और भारत में चल रही आज़ादी की लड़ाई से एकजुटता के संदर्भ में ही 1936 में अविभाजित भारत में हिन्दी, उर्दू और अन्य भाषाओं के लेखकों ने मिलकर प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की थी और पूरे भारत में जगह-जगह प्रलेस के जलसे होते थे। सरगोधा का जलसा भी उसी की एक कड़ी था।
इस जलसे में प्रेमचंद की कहानी का उल्लेख होना भी सांकेतिक रूप से बहुत महत्त्वपूर्ण था। प्रलेस की स्थापना 1936 में हुई थी और इसका पहला सम्मेलन लखनऊ में आयोजित हुआ था जिसकी अध्यक्षता उर्दू-हिन्दी के लेखक प्रेमचंद ने की थी। जिया और कीनु का प्रलेस के जलसे में शामिल होना यह बताता है कि वे दोनों वैचारिक रूप से प्रगतिशील थे और उनका साहित्य से अनुराग था। कीनु उर्फ सरदार इशर सिंह खुद शायरी करते थे।
कीनु और जिया हिन्दू और मुसलमान होते हुए भी एक दूसरे से प्रेम इसीलिए कर सके क्योंकि धर्म उनके प्रेम के बीच अवरोध बनकर उपस्थित नहीं हो सकता था। उन्हें मालूम था कि अलग-अलग धर्म के होने के कारण उनका मिलन आसान नहीं है लेकिन दोनों अपने धर्म को त्यागकर और ईसाई बनकर चर्च में शादी करने के लिए भी तैयार थे। फ़िल्म यह भी बताती है कि जब तक दंगे-फसाद शुरू नहीं हुए थे हिन्दू और मुसलमान घुलमिलकर रहते थे। उनका एक-दूसरे के यहाँ आना-जाना था।
वे एक दूसरे के यहाँ शादी-ब्याह में शामिल होते थे। कीनु और जिया का अपने शहर में बिना किसी डर के साइकिल चलाते हुए मटरगश्ती करना बताता है कि सरगोधा उनका अपना शहर था। वहाँ की सड़कें, खेत-खलिहान, बाजार सब कुछ उनकी साझा पहचान का हिस्सा थे। सरगोधा दरअसल सरगोधा नहीं था। फ़िल्म के सरगोधा में अविभाजित भारत के वे सब गाँव और शहर समाए हुए थे जिनके सीने में बंटवारे की तलवार घौंप दी गयी थी।
इसीलिए जब कहा गया कि उन्हें यहाँ से जाना पड़ेगा क्योंकि धर्म के आधार पर देश का बंटवारा हो गया है तो इसकी चोट उनके दिलों पर कितनी गहरी लगी होगी उसको समझना कोई बहुत मुश्किल नहीं है।
सैंकड़ों सालों से साथ-साथ रहने वालों से यह कहा जाए कि तुम्हारे पड़ोस में रहने वाला तुम्हारा शत्रु है क्योंकि उसका धर्म तुमसे अलग है, यह बहुत अस्वाभाविक भी है और क्रूर भी। सैकड़ों सालों से एक साथ रहने वालों में दुश्मनी और नफरत स्वाभाविक चीज नहीं थी। वह अंदर से नहीं उपजी थी उसे बाहर से उनके दिलों और दिमागों में भरा गया था। इसीलिए इशर सिंह अपनी बड़बड़ाहट में दंगा करने वालों को मंगल से आए हुए एलियन कहता है।
वह हिटलर का उल्लेख भी मार्स से आए हुए एलियन के रूप में करता है। यह महज संयोग नहीं है कि सब कुछ भूल जाने वाला इशर सिंह मंगल ग्रह के उन एलियन को नहीं भूलता जो असली अपराधी थे। हिटलर का नाम लेकर इशर सिंह बता देता है कि असली अपराधी कौन है, तब भी और आज भी। वे हिटलर के ही भाई-बंद हैं। विभाजन के अपराधियों के रूप में साम्राज्यवाद और फासीवाद की शिनाख्त बहुत महत्त्वपूर्ण है।
फ़िल्म में अतीत की स्मृतियों के रूप में कई प्रसंग बार-बार इस बात को रेखांकित करते हैं कि विभाजन लोगों पर थोपा गया है। यह विभाजन के शिकार हुए लोगों का चयन नहीं था। अंग्रेजी सत्ता के नुमाइंदे रेडक्लिफ़ द्वारा अविभाजित भारत को जाने-समझे बिना नक्शे को सामने रखकर कागज़ पर ही रेखा खींचकर देश को विभाजित कर दिया गया। विभाजन के कारण लाखों-लाख लोगों को अपनी धरती से उखाड़ फैंका गया, यह कोई मामूली अपराध नहीं था।
सरगोधा में रहने वाले हिन्दू और सिख वहाँ से नहीं जाना चाहते थे। लेकिन दंगों के भड़कने के बाद वहाँ से जाने के अलावा कोई विकल्प उनके पास नहीं बचता। कीनु के परिवार के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि घर की औरतों को कैसे बचाया जाए। एक मुस्लिम पड़ोसी के यहाँ इस उम्मीद से वे घर की औरतों और बच्चों को छोड़ जाते हैं कि वहाँ वे सुरक्षित रहेंगी और जब शांति होगी तब वे लौट आएंगे या उन्हें आकर ले जाएंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाता।
उस घर पर बाहर से आए दंगाई हमला कर देते हैं। दंगाइयों के हाथों औरतें मारी जाती हैं और कीनु की दादी लड़कियों को दंगाइयों के हाथों में पड़ने से बचाने के लिए चाकू से उनका गला काट देती है। यह उतनी ही भयावह घटना थी जितनी तमस में अपने बच्चों के साथ कूदकर आत्महत्या करती सिख औरतों का दृश्य था। फ़िल्म बताती है कि दंगे दोनों तरफ से हुए थे हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों को मारा और मुसलमानों ने हिंदुओं और सिखों को मारा। सरहद के दोनों तरफ दरिंदगी का नंगा नाच चल रहा था।
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने कहा था कि पंजाबी ही पंजाबी को मार रहा था। विभाजन के समय सबसे भयावह दंगे पंजाब में ही हुए थे। लेकिन बंटवारे के समय हुए दंगों के कारण पंजाब के बाशिंदों को मजबूर होकर अपना घर और गाँव छोड़ना पड़ा। दंगों में माना जाता है कि दस से बीस लाख लोग मारे गए जिनमें हिन्दू, सिख और मुसलमान तीनों शामिल थे। मानव इतिहास में विस्थापन की ये सबसे बड़ी और भयावह घटना थी।
नफरत और घृणा के माहौल में भी ऐसे लोग बहुत थे जिन्होंने भले ही अपना घर और अपनी ज़मीन छोड़नी पड़ी हो लेकिन उन्होंने अपने दिलों में नफरत का जहरीला बीज नहीं पनपने दिया। जिया और कीनु का प्रेम कुछ-कुछ वैसा ही था। मैं वापस आऊँगा दो व्यक्तियों की प्रेम कहानी भर नहीं है। वह उनके अनंत वियोग की कहानी भी है। विभाजन के छह साल बाद 1953 में कीनु एक बार फिर सरगोधा जाता है जहां उसे मालूम पड़ता है कि उसके परिवार की सारी औरतें मारी जा चुकी है।
वह अफसाना के यहाँ भी जाता है जिसकी शादी हो चुकी है। अफसाना का पति बताता है कि उसकी पत्नी उसे जानती है और मिलना चाहती है। लेकिन शादीशुदा जिया का इंतजार करने का साहस कीनु नहीं जुटा पाता और वह बिना मिले ही वहाँ से चला जाता है। अगर कीनु उस समय अपने अंदर इतना साहस जुटा पाता तो मृत्यु शैय्या पर जिस आंतरिक वेदना से उसे गुजरना पड़ रहा था शायद वह कुछ कम होती।
मैं वापस आऊँगा दो प्रेमियों को एक-दूसरे से जबरन अलग किए जाने की कहानी भी है। लेकिन यह दो व्यक्तियों तक सीमित कहानी भी नहीं है, यह अपनी ज़मीन से जबरन उखाड़े जाने की कहानी भी है जो उनकी स्मृतियों में 78 साल बाद भी जिंदा है। निर्वैर जब 78 साल बाद हाथ में मोबाइल लिए अपने दादा की प्रेमिका जिया के घर की खोज में सरगोधा की सड़कों, बाजारों और गलियों से गुजरता है तब वीडियो देखते हुए उसके दादा उसे बराबर बताते हैं कि अब कौन-सी जगह आएगी, कौन-सा बाज़ार आएगा और किसका घर आएगा।
वह उस चर्च को भी याद करता है जहां उन दोनों ने शादी करने का सपना देखा था। 78 साल पहले की दुनिया उसके वजूद का हिस्सा अब भी बनी हुई थी। जब निर्वैर उस घर तक पहुँच जाता है जहां जिया रहती थी तो उसके मन में एक उम्मीद जगती है कि मुमकिन है कि जिया भी जिंदा हो। जिया को कीनु ने 78 साल से देखा नहीं है लेकिन वह भी उसके मन-मस्तिष्क में अब भी ज़िंदा है। जिया की भाभी बताती है कि जिया दस साल पहले इस दुनिया से विदा ले चुकी थी।
वह बताती है कि जिया अंतिम क्षण तक अपने मन में उम्मीद जगाए रही कि कभी कीनु आएगा क्योंकि उसने कहा था : ‘मैं वापस आऊँगा’। और इस वचन की पीड़ा ही कीनु उर्फ इशर सिंह को न जीने देती है और न ही मरने देती है। जिया के घर में वहाँ की दीवार पर लगी जिया की आदमकद तस्वीर ही उसका आखरी मिलन होता है।
विभाजन पर पहले बनी अधिकतर फ़िल्मों से यह इस अर्थ में भिन्न है कि यह संभवतः पहली फ़िल्म है जो विभाजन की विभीषिका को एक ऐसे ट्रॉमा के रूप में पेश करती है जिससे बाद की पीढ़ियों के लिए मुक्त होना आसान नहीं है। टोबा टेक सिंह की लाश भारत और पाकिस्तान की सीमा के बीच में नहीं उन सब परिवारों के कंधों पर पड़ी है जिनके दादा-परदादा आग के दरिए गुजरे थे। यह फ़िल्म उस अतीत को ऐसी स्मृतियों के रूप में पेश करती है जिसके परिप्रेक्ष्य में हम अपने वर्तमान को देख और समझ सकते हैं।
यह फ़िल्म वर्तमान में चलती है लेकिन स्मृति के रूप में विभाजन बार-बार आता है। विभाजन और विस्थापन का अतीत और वर्तमान दोनों एक-दूसरे में इस कदर घुलमिल जाते हैं कि जब फ़िल्म समाप्त होती है तो ऐसा लगता है कि विस्थापन की त्रासदी समाप्त नहीं हुई है बल्कि इसके घाव देश की सीमाओं को लांघते हुए कैंसर की तरह दुनिया के हर हिस्से में पहुँच चुके हैं क्योंकि न फासीवाद समाप्त हुआ है और न ही साम्राज्यवाद।
अतीत में बहुत दूर न भी जाएँ तो भी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से युद्ध, नरसंहार और निरंतर चलने वाला विस्थापन पिछले 80 साल के इतिहास की सबसे भयावह सच्चाई है।
मैं वापस आऊँगा फिल्म के अंतिम पाँच मिनट के हिस्से में जब फिल्म की प्रेम कहानी गहरी पीड़ा के साथ समाप्त हो जाती है, ठीक उसी समय एक गीत शुरू होता है ‘क्या कमाल है, ना मुसीबतें, ना मलाल है, ना शिकायतें, ना सवाल है’ गीत के साथ गज़ा, फिलिस्तीन, ईरान, सोमालिया और उन सब जगहों के दृश्य एक-एक कर आने लगते हैं जहां आज भी युद्ध चल रहे हैं। बमों से ढहते और उजड़ते शहर, इमारतें, गाँव और गलियां। लोगों को अपने देश, अपने शहर और अपने घरों से उजाड़ा जा रहा है, बच्चों, औरतों और वृद्ध लोगों की निर्मम हत्याएं की जा रही हैं।
किसी सुरक्षित ठिकाने की आस में एक जगह से दूसरी जगह मीलों भटकते हजारों-हजार औरतें, बुड्ढे और बच्चे। उन्हें शरणार्थी शिविरों में रहने के लिए मजबूर किया जा रहा है। एक-एक निवाले के लिए उन्हें हाथ फैलाना पड़ रहा है। लेकिन हकीकत यह भी है कि एक और दुनिया है जो इन सब से अलग है। इस दुनिया को न किसी तरह की शिकायत है और न कोई सवाल है। जिसके हाथ मासूम बच्चों के खून से रंगे हैं। यह मैं वापस आऊँगा फिल्म का एक ऐसा आयाम है जो इस त्रासदी को महकाव्यात्मक बना देता है।
(लोकलहर से साभार)